सिर्फ मत परिवर्तित न होईए!

24/3/2015

Don't be just indoctrinated!

अग्रलिखित आप पाएंगे

1) वह समस्या जिसने शताब्दियों से ईमानदारी से सोचने वाले व्यक्तियों को भ्रमित कर दिया।

2) अत्यधिक भावुक और दिलचस्प पहेली का यीशु के द्वारा बाइबिल में दिया गया समाधान ईमानदारी से पढ़िए और यीशु के इस समाधान का भरपूर आनंद उठाईये।

क्या आप सिर्फ मत परिवर्तित हुए हैं?

कुछ ऐसे उदाहरण सामने आये हैं कि यदि एक व्यक्ति इस्लाम धर्म के साथ पलता-बढ़ता है और उसका जवानी में ही मत परिवर्तित कराया जाए तब इस बात की ज्यादा संभावना नहीं है कि वह ईसाई बन सके।

बेशक वही उदाहरण, किसी हिन्दू या बौद्ध या फिर कोई ऐसा जो आलस की वजह से या बईमानी युक्त अंतरात्मा के कारण या फिर किसी सामाजिक लोभ की वजह से नास्तिक धर्म में फँसा हो, के लिए दिया जा सकता है। आप चाहे जो कुछ भी ‘‘हों”, आपके माता-पिता ने जो सिखाया, आपके चारों तरफ के माहौल ने या देश ने जो बताया, आपकी स्वंय की शारीरिक इच्छाएँ या आपके जीवन साथी ने जो धर्म मानने हेतु आकर्षित किया, आप इन सभी का मिला-जुला सार्वभौमिक परिणाम हैं।

क्या वास्तव में ? यही हमारे मानव जीवन की कहानी है?

अरे वाह।

यह कितना हास्यास्पद है

और फिर भी उतना ही सच है।

कैसे इतना सहज ‘‘मत परिवर्तन‘‘ हास्यास्पद और सच दोनों हो सकता है?

क्या आप निश्चित तौर पर जानना चाहेंगे?

आश्चर्य की बात है कि यह मुद्दा बिलकुल सही है। अधिकतर यह पाया गया है कि वे लोग समाजिक या पारिवारिक या सांस्कृतिक या व्यवसायिक लाभ हेतु या प्रेम के लिए जिनका मत परिवर्तन करवाया गया है, वे गिरगिट की तरह ‘‘रंग बदलते है‘‘, और उनके आस पास जो भी है वे उन जैसे बनकर उन्हीं का समर्थन करने लगते हैं। ठीक आपके समक्ष इस बात का सच्चा सबूत एक गहन प्रेक्षक के रूप मे सप्ताह के हर रविवार की सुबह चर्च में, शुक्रवार को मस्जिद में तथा शनिवार को यहूदी सभाग्रह में देखा जा सकता है। आपमें से ज़्यादातर लोगों के लिए ईसाई जगत् एक निर्विवाद अंतिम साक्ष्य से सराबोर है जिसमें ‘‘आप वह हैं जो लोगों ने आपको बताया”। ज़रा आस-पास पूछ कर तो देखिये।

इसकी कुंजी यहाँ है। आप किसी भी रंग, रूप, प्रजाति या धर्म के ऐसे कितने लोगों को जानते हैं जो हिम्मत करके यह सवाल उठायें कि यह दुनिया यानी उनकी दुनिया उन्हें क्या प्रदान कर रही है? यीशु ने कहा ‘‘लगभग कोई भी नहीं‘‘।ल्यूक 13:23-28 और मैथ्यू 7:13-23 देखें। जो लोग कहते है ‘‘प्रभु, प्रभु आपने हमें हमारे घर में शिक्षा प्रदान की तथा हमारे साथ बैठ कर भोजन किया” उनमें से ऐसे लोग ‘‘बहुत ही कम होंगे जिन्हें अनंत जीवन की प्राप्ति हुई होगी”। यीशु ने कहा की वह उन्हें कभी नहीं जानते थे। वे लोग ‘‘सोचते” थे कि सब कुछ ठीक था परन्तु वे लोग बहुत ग़लत थे। यीशु ने कहा ‘‘अधिकतर लोग‘‘ इसी श्रेणी में आते हैं। और गुरुत्वाकर्षण कि तरह कोई व्यक्ति ‘‘गुरुत्वाकर्षण या यीशु के सत्यों में विश्वास” करे या न करे -- उनकी सहमति या असहमति के बिना भी ‘‘जीवन या मृत्यु” एक स्तर तक अहमियत रखते है।

आप जानते हैं कि यह सत्य है: ईसाई जगत् का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा ही समझौता, सांसारिक प्रेम व शंकास्पद जीवन व भाषण तथा प्राथमिकताओं पर वास्तविक रूप से सवाल उठाता है- उनके चारों और की यह उदासीनता ही उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी है। अधिकतर लोगों के लिए भाषण और किताबें तथा संगीत और सामाजिक जीवन यीशु की वास्तविकता को स्वीकार करने योग्य विकल्प हैं। किसी उपदेश या ग्रन्थ में उल्लेखित ‘‘परदे के पीछे का व्यक्ति” और आपके बगल में कुर्सी या दरी पर बैठा इंसान दोनों पूरी तरह से ठीक हैं, यदि वे सही बातें कहते हैं, ‘‘क्योंकि तब मैं भी ठीक हूँ”। उपरोक्त वर्णित व्यक्तियों के शब्दों में यदि तत्त्व और जीवन और दृढ़ विश्वास है तो मुझे तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक कि प्रत्येक व्यक्ति मेरे पाप को भी स्वीकार कर ले।

एक बार फिर... यीशु में शानदार समाधान पाने के लिए इसे आगे पढ़ते रहें।

ईसाई जगत् में कई व्यक्तियों को वास्तव में यह दृढ़ विश्वास नहीं है कि क्या उनका जीवन उन सिद्धांतों के जैसा दिखता है जिनका वे समर्थन करते है -- यीशु के आदेशों का। यीशु ने स्वंय इन आदेशों को ‘‘मोक्ष पाने कि शर्तें” न बनाकर बल्कि अपनी आत्मा में ‘‘मोक्ष पाने कि कसौटियां” बनाया। कई लोगों के लिए ‘‘गिरजाघर” और ‘‘ईसाई धर्म” बदकिस्मती से कुछ ऐसा बन गए हैं जिसमें उपस्थित हों एंव अपने दिमाग और सामाजिक जीवन को व्यस्त रखें -- बजाय इसके जीवन और मरण के महत्त्वपूर्ण नियम या अनुबंध, जैसा कि यीशु ने बनाया है।

मानव जीवन की शुरूआत से ही धर्म अन्धविश्वास को बढ़ाने, तथा मनोरंजन, भावनाओं व सामाजिक रिक्तता भरने का एक ज़रिया बनता रहा है। साथ ही यह अपराध बोध कम करने का एक साधन बन गया है। जैसा कि इस लेख का शीर्षक दर्शाता है, यह स्थिति ईसाई, हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध व नास्तिक को ‘‘मत परिवर्तन” की ओर ले जाती है ताकि वर्तमान युग में इन मुद्दों को दरकिनार कर एक आरामदायक ज़िन्दगी जी सकें। एक औसत ‘धर्मालु‘ को अपने ‘‘दृढ़ विश्वास” के कारण अपने बहुमूल्य रिश्तों की बलि चढ़ाना पढ़े या उनकी नौकरी को नुकसान पहुँचे या उनकी वित्तीय स्थिति पर आंच आए या उनकी नींदे उड़ जाये तो इस ‘‘दृढ़ विश्वास” को वास्तव में कुछ करना होगा नहीं तो यीशु की सीखों को इतनी आसानी से फेंक दिया जायेगा जैसे कि कल का अखबार।

अवसरवादी व हठधर्मी ‘‘सामाजिक ईसाईजन” वह सरल मार्ग चुनते हैं, जो राजनैतिक रूप से सही मार्ग है साथ ही सर्वमान्य ‘‘शांतिपूर्ण मार्ग”। यीशु ने इसी को ‘‘व्यापक मार्ग” का नाम दिया है।

उपर्युक्त मुद्दे ईसाई धर्म प्रचारक, प्रतिवादी ईसाईयों, उदारवादी ईसाईयों या करिश्माई व्यवस्थाओं में अक्सर पाए जाते हैं। जब यही मुद्दे ‘‘ईसाई‘‘ संस्कृति में या किसी धर्म सभा में उपस्थित रहते हैं तो कई केवल ‘‘मत परिवर्तित” हो जाते हैं। और यह बौद्ध या मुस्लिम या हिन्दू या फिर नास्तिक के रूप में ‘बड़े होने‘ से वास्तव में किस तरह से भिन्न है। ईमानदारी से कहें तो यह एक जैसा ही है। यीशु के अनुसार केवल मत परिवर्तित होने वाले सुरक्षित नहीं रखे जा सकते। क्यों? क्योंकि जीवटता में कमी, प्यार, दृढ़ विश्वासऔर यीशु के चमत्कारिक तरीके से हुए उसके सत्यों को पूर्ण रूप से सौंपना ईसाई नहीं है और न ही वह द्वार जिससे मोक्ष तक पंहुचा जा सके। यदि मत परिवर्तन होने के कारण आपको इस पर विश्वास करना कठिन लगे तो ल्युक के अध्याय 9 से 14 तक का अध्ययन करें। देखिये स्वंय यीशु ने दुनिया भर में सर्वव्यापी लोकप्रिय विचारधारा के विपरीत उसके अपने सत्य ‘‘धर्म” के बारे में क्या कहा। जॉन 1 पढ़िए, यह पुस्तक जिसे ‘‘प्रेम के दूत” ने पेन्टीकोस्ट पर्व के साठ वर्ष बाद ‘‘दूसरी पीढ़ी” के उन लोगों के लिए लिखी जो शायद केवल अपने माता-पिता द्वारा बनाई गयी बातों को स्वीकार करते चले आ रहे थे। जॉन ने ईसाई परंपरा पर आधारित सच्चे एंव झूठे धर्म परिवर्तिनों के ऐसे प्रमाण दिए जो ‘यीशु कि अंतरात्मा‘ के अनुसार यह साबित करते है कि किसी व्यक्ति को वास्तविक रूप से सुरक्षित रखना प्रतीत होता है बजाय केवल ‘‘मत परिवर्तित” होने के।

और इसलिए यह सत्य है - यदि दुनिया के विभिन्न देशों यथा भारत, जापान, ब्राज़ील, सऊदी अरब, ईरान, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, सीरिया, ज़िम्बाब्वे आदि में पैदा हुए अधिकतर लोग, जो कुछ उनके आस-पास दिख रहा है, सरलता से स्वीकार कर लेते हैं और बिना आगे कुछ सोचे जो कुछ व्यक्तिगत उपहार या स्वीकृति के रूप में मिलता है। वे मुस्लिम राज्य में बिना चूके मुस्लिम ही बनेंगे। और इसी तरह सभी अन्य भी। अधिकतर लोग बिना कोई प्रश्न किए उन चूहों की तरह झुंड में चलते जाएँगे जो खतरनाक मंज़िल की ओर बिना रुके चलते जाते हैं।

परंतु रुकें। क्या आप इसे सुन सकते हैं?

अब सुनिये —

वह यह है!

‘‘इसे जानिए”, यह सेनाओं के यहोवा की वाणी है। तुम और प्रत्येक व्यक्ति ‘उसे‘ चुन सकता है। क्यों? क्योंकि स्वयं प्रभु ने प्रत्येक इंसान को आदेश दिया है कि वह उनका आमंत्रण स्वंय अपने हृदय से सुने। (रोमन्स 1:16-32)

अधिकतर लोग अपने स्वार्थ के लिए इस वाणी को नहीं सुनते हैं। यद्यपि प्रारंभ से ही इस गोल घूमते हुए राकेट जहाज में पैदा हुए शत प्रतिशत 14 अरब लोगों को अलौकिक और अपरिहार्य तरीके से प्रभु स्वंय पितृ रूप में अपने बच्चे को दावत का आमंत्रण देते हैं। तथापि अधिकांश लोग, बजाय प्रभु की वाणी को सुनने तथा उसके समक्ष आत्म-समर्पण की प्रतिक्रिया देने के, जो कुछ भी उनके चारों तरफ है से ‘‘मत परिवर्तित” होना चुन लेते हैं। फिर भी, प्रत्येक व्यक्ति अपनी जवानी से 120 वर्ष की आयु तक स्वंय प्रभु से सुन रहा है। यह ऐसा ही है। इस बारे में कोई ग़लती न करें।

वाह क्या शानदार खबर है यह, और फिर भी मानवता के लिए कितनी निंदनीय है। बजाय दैविक घटना और उपलब्ध अवसर के, अधिकतर लोग अब भी आदमियों और अपने सगे संबंधियों की स्वीकृति, अपनी स्वयं की खुशी और अपनी सुविधा तथा अपने स्वयं के निर्णय लेते हैं। दुनिया भर में रविवार को चर्च की अशुद्ध व पुनर्जन्म की कुर्सियों पर बैठकर और मस्जिद में जानवाजों पर बैठकर ईश्वर के आमंत्रण को लौटाने का कायरतापूर्ण व आलसपूर्ण निर्णय (कि प्रभु हर एक आदमी व औरत को देता है) बार-बार लिया जाता है। यही वह है जहां अब्बा अपने अंदर के आदमी से या परिस्थितिवश झूठे ईश्वरों से मुकाबला करता है। अधिकांश लोग ‘‘यह नहीं चाहते कि यीशु उन पर शासन करें” बल्कि ‘‘ईश्वर बनकर स्वयं यह चुनते है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा।”

सही उत्तर पाने के लिए इस लेख को पूरे अंत तक पढ़ना याद रखिये।

केवल ‘‘कुछ” ही, चाहे मुस्लिम या ‘‘ईसाई” या हिन्दू या बौद्ध या नास्तिक धर्मवाले, अपने अंतःकरण में ईश्वर की वाणी को सुनना बंद कर देते है जो एक सच्चे ईश्वर व उसके एकमात्र पुत्र मसीहा यीशु को पाने का साक्ष्य देते है। कुछ (जैसे- डौलोस-ईश्वर के प्यार व जीवन का दास) ईश्वर को सभी निर्णय और सभी प्राथमिकताऐं, संबंध, समय का निवेष व प्रत्येक तरह के संसाधन तय करने देते हैं। जबकि ‘‘अधिकांश” लोग ईश्वर को एक सुरक्षा कवच, एक दिलासा देने वाला, शीशी मे कैद जिन्न, एक वकील के स्वयं संतुष्ट तर्क या एक सामाजिक जाल -एक पारिवारिक पिकनिक के रूप में देखते है। ज़्यादातर सभी लोग लंबी बेंच पर बैठकर चाहे शुक्रवार या शनिवार या रविवार हो, या घर पर या कार्यालय में पवित्र आत्मा के अपने पुत्र की शहादत देने की कराहने की पीड़ा को नजर अंदाज कर देते हैं। क्योंकि ये दुनिया और इस दुनिया की वस्तुएँ और इस दुनिया का प्यार उनके लिए अपने अंतःकरण से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अतः वे अपने अंतःकरण को नष्ट कर रहे हैं।

‘‘लोगों की अनीश्वरवादिता और दुष्टता के विरुद्ध ईश्वर का कोप स्वर्ग से प्रकट हो रहा है।

जो अपनी दुष्टता से सच का दमन करते हैं।

चूंकि ईश्वर के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह उनके लिए सरल है क्योंकि ईश्वर ने इसे उनके लिए सरल ही बनाया है।

जबसे ये दुनिया बनी है ईश्वर के अदृष्य गुणों, उनकी अनंत शक्ति व दिव्य प्रकृति साफ देखी जा सकती है।

जो बन चुका है उसे समझकर ताकि लोगों के पास कोई बहाना न हो। यद्यपि वे ईश्वर को जानते थे तथापि उन्होंने न तो ईश्वर को महिमामंडित किया और न ही ईश्वर को कभी धन्यवाद दिया,

परंतु उनकी सोच निष्फल हुई और उनके मलिन हृदयों में अंधेरा छा गया।

ईश्वर ने इन लोगों को उनके हृदयों की पापी इच्छाऐं, एक दूसरे के शरीर की यौन अशुद्धता कम करने के बजाए, इनकी जागृति की।

उन्होंने एक झूठ के लिए ईश्वर की सत्यता के बारें में विचार-विमर्श किया और पूजा की और सृजन की हुई वस्तुओं की सेवा की बजाय सृजनकर्ता के -- जिसकी हमेशा से ही प्रशंसा की। तथास्तु।’‘

‘‘मैं एक पवित्र आत्मा को तुम्हारे पास भेजूंगा और जब वह आ जायेगी, वह इस पाप की दुनिया और धर्म की दुनिया और न्याय की दुनिया को पापी व अपराधी घोषित कर देगी क्योंकि वे लोग मुझमें विश्वास नहीं रखते ओर न ही धर्म में और क्योंकि मैं अपने पिता के पास जाता हूँ और आप मुझे अब नहीं देख सकते क्योंकि इस दुनिया के शासक को, उसके निर्णय को आंका गया।”

जॉन 16:8-11

अब यहाँ पर एक खुशखबरी है!

‘‘परंतु जितने भी लोगों ने ईश्वर को पाया है उन्हें ईश्वर ने अपने पुत्र बनने का अधिकार दिया, यहाँ तक कि उन्हें भी जो ईश्वर के नाम में विश्वास रखते थे जो न तो खून से, न ही हाड़-मांस की मर्जी से और न ही किसी इंसान की मर्जी से पैदा हुए बल्कि ईश्वर की संताने हुईं।” ‘‘ऐसे बच्चे जो किसी इंसानी माता-पिता या इंसानी इच्छा से या एक पति के निर्णय से पैदा नहीं हुए परंतु ईश्वर के द्वारा।”

ईश्वर स्पष्ट है कि इंसानी वचनबद्धता या बौद्धिक निर्णय हमारी आत्माओं को नहीं बचा सकते। ईस्वर उतना ही स्पष्ट है कि आपके माता-पिता के द्वारा दी गई विरासत और आपका सांस्कृतिक पालन-पोषण आपकी या मेरी आत्मा को बचा नहीं सकते और न ही बचाएँगे। आप स्वयं को ‘‘दूसरी बार जन्म की ओर नहीं” ‘‘ले जा सकते।” ‘‘यीशु ने कहा दूसरे जन्म को उसके स्वर्ग में जाने के लिए आवश्यक रूप से बचाया जाना चाहिए। जन्म व पुनर्जन्म केवल एक महत्वपूर्ण घटना हो सकती है, एक सामयिक क्षण। पारिवारिक पालन-पोषण या रविवार को चर्च जाना या सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण का बहुत ही कम प्रभाव पड़ता है सिवाय इस संदर्भ में (जैसा कि रोम में पॉल ने यहूदियों से कहा) कि जहाँ सत्य के बीज उन लोगों के लिए बोए जाते हैं जो उसे प्राप्त करेंगे व उसकी आज्ञा का पालन करेंगे। खून से हुए और यीशु के पुत्र की आत्मा के पुनर्जन्म को ईष्वर का चमत्कार कहते हैं जिसे दोस्तों या परिवार या जीवन साथी या बच्चों व सह कर्मियों का दबाव संभवतः प्रभावित नहीं कर सकता है। आप स्वंय को ‘‘दूसरी बार जन्म” की ओर नहीं ले जा सकते। यह एक प्रतिज्ञापत्र बनाने जैसा है जिसमें अनंतकाल तक दो पक्षों द्वारा शपथ ली जाती है। वापसी का कोई रास्ता नहीं होता है।

साईमन पीटर ने कहा ‘‘तुम ईसा मसीह हो, जीवंत ईश्वर का पुत्र ।” और यीशु ने उससे कहा, ‘‘तुम धन्य हो साईमन क्योंकि मांस और खून ने तुम्हें ये प्रकट नहीं किया परंतु मेरे पिता, जो स्वर्ग में हैं, ने तुम्हें प्रकट किया। मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम पीटर हो और इस चट्टान पर

स्वर्ग से मेरे पिता के द्वारा किया गया तुम्हारा व्यक्तिगत रहस्योदघाटन, मैं अपना चर्च बनाऊंगा और नरक के दरवाजे भी मेरे चर्च को जीत नहीं पाऐंगे।”

यीशु में जीवन की चट्टान यह है कि प्रत्येक पुरुष, प्रत्येक स्त्री जो अपने आपको उसका अनुयायी कहेंगे, यीशु की कृपा व शक्ति से दो बार जन्म लेने के चमत्कारिक कार्य, प्रत्येक व्यक्ति जो अपने आप को ईसाई कहलाने वाला और यीशु के चर्च का सदस्य ये सभी अपने अपने तरीके से यीशु का रहस्योद्घाटन करेंगे वैसे ही ‘‘जैसे मांस और खून ने कुछ प्रकट नहीं किया।” असल में ‘‘चर्च जाने से मोक्ष प्राप्त करने का केवल चमत्कार जो वास्तविक व सच है, उत्पन्न नहीं हुआ या बाईबिल के पाठ सुनने से और फिर दोस्तों के साथ जाने से या माता-पिता या अपने जीवनसाथी को खुश करने हेतु या केवल इसलिए कि बौद्धिक रूप से इसका अत्यधिक अर्थ निकलता है, ईश्वर के अनुसार इन सब स्थानों पर मोक्ष नहीं हो सकता है। यीशु शत-प्रतिशत सही हैं और एकमात्र मार्ग है पिता यहोवा ईश्वर तक पहुँचने का। यीशु में ही मोक्ष है इस बात की परवाह किए बिना कि एक व्यक्ति किस सांस्कृतिक धर्म में ‘‘मत परिवर्तित” हुआ हो, सही या ग़लत। यीशु की आवाज़ सुनने में मोक्ष ढूंढ़ा जाता है और उन्हें स्वयं को पूर्ण रूप से यीशु के अधिकार में सौंप देने को चुनने में।

अब क्या होता है जब कोई व्यक्ति हार्दिक स्तर पर साहसिक रूप से यीशु की आवाज़ का सामना कर चुका होता है। पढ़िए अध्याय 2:36-47 और देखिए, कैसे यह प्रश्न ‘‘हमें सुरक्षित रहने के लिए क्या करना चाहिए? ” पूछा गया और उसका उत्तर कैसे दिया गया। जो यीशु को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं उनके द्वारा दिए गए उत्तर में सत्त्व व विशेषता की ओर ध्यान दीजिए। क्या हम भी उसी प्रकार उत्तर देने का साहस करते हैं जैसे वे जो यीशु के साथ चलते थे। हमें कोशिश करनी चाहिए। और फिर देखिए कितना सही परिवर्तन और कैसे एक व्यक्ति के जीवन में ईश्वर के समाहित होने से सब कुछ बदल जाता है उनके अंदर के आदमी की तृप्ति व संतुष्टि के साथ ईश्वर की आत्मा सेः अध्याय 2:36-47

मोक्ष मिलता है मुकाबला करने से, सामना करने से और अपने आप को यीशु को सौंप देने से (उर्फ, ‘‘आस्था” ‘‘विश्वास”) साथ ही किसी की पूरी जिन्दगी भूत, वर्तमान, भविष्य आशाएँ, अपने संबंध, आदतें, नौकरी, स्वभाव, प्रतिभाएँ, वित्त, परिग्रह, डर, महात्वाकाक्षाएँ, गौरव व पारिवारिक सदस्यों को। जो यीशु को पाने की इच्छा रखते हैं और यीशु के सक्षम हाथों में अपना सर्वस्व सौंप देते हैं तब ही उनका यीशु के द्वारा उद्धार होता है। और जब हम उसे किसी भी तरह पाने में असफल होते है तब हम शीघ्रता से वापस उसी जगह पर चले जाने का चयन कर लेते हैं जो यीशु में गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र है। यीशु के समक्ष व्यक्तिगत सामना करना और पूर्णतः बिना शर्त वाली ‘‘कोई दूसरी योजना न होना,‘‘ ‘‘यदि कोई भी मेरे साथ न चले फिर भी मैं तो चलूंगा, ” यीशु को प्रतिक्रिया देना और यीशु में पूर्ण रूप से विसर्जित हो जाना, केवल इन्हीं से बाइबिल में वर्णित मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। यीशु ने उन लोगों से, जो यह दावा करते थे कि वे यीशु को जानते थे, जो यीशु के साथ खाना खाते हैं और जो उसकी सीखों को ध्यान से सुनते हैं और जो यीशु के कार्य करते हैं, कहा ‘‘कुछ ही लोग ऐसे होंगे जो मोक्ष प्राप्त कर पायेंगे”। परंतु ‘‘अधिकांश” लोग उस व्यापक मार्ग पर केवल किसी-न-किसी में मत परिवर्तित हो जायेंगे- यीशु ने कहा।

क्या आप, मत परिवर्तित हुए हैं? क्या आप, सिर्फ मुस्लिम ही होंगे, यदि आपने ईरान में जन्म लिया है? दूसरे शब्दों में क्या आप केवल भावुक, अंध विश्वासी, सख्त नाशवान हो?

या क्या आप, क्या आप अत्यधिक उच्चस्तरीय ईश्वर के अनुयायी होंगे? आपके अंदर यीशु की आत्मा के साथ आप ईसाई में विश्वास रख यीशु को सौंपे हुए हो?

आह, वह ‘‘अधिक अच्छा‘‘ स्थान ही हैः

ऊठो, ईश्वर के हे पुरुषों व स्त्रियों।

अपने भाग्य को चमकाओं - दुनिया को यीशु में बदलने हेतु।

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